म्यूचुअल फंड में यह 5 गलती बहुत निवेशक करते हैं, आप मत करें।

म्यूचुअल फंड में यह 5 गलती बहुत निवेशक करते हैं, आप मत करें।

क्या आप जानते हैं कि भारत में 80% से ज़्यादा नए म्यूचुअल फंड निवेशक अपने पहले साल में कोई न कोई बड़ी गलती कर बैठते हैं? SEBI की 2024 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हर 10 में से 6 निवेशक सिर्फ इसलिए नुकसान उठा लेते हैं, क्योंकि उन्होंने बेसिक चीज़ों को नज़र अंदाज़ कर दिया।

म्यूचुअल फंड एक बेहतरीन निवेश का विकल्प है, लेकिन सिर्फ तब, जब आप सही तरीके से निवेश करें। बहुत से लोग SIP शुरू कर देते हैं, लेकिन सही जानकारी के बिना वो बड़ी गलतियां कर बैठते हैं, जो उनके रिटर्न को कम कर देती हैं।

आज के इस आर्टिकल में हम आपको म्यूचुअल फंड की 5 सबसे आम गलतियों के बारे में बताएंगे, जो ज़्यादातर भारतीय निवेशक करते हैं, और यह भी समझाएंगे कि इनसे कैसे बचें।

आम निवेशक ये गलतियां क्यों करते हैं?

जब बात म्यूचुअल फंड की आती है, तो ज़्यादातर लोग दोस्तों की सलाह या यूट्यूब वीडियो देखकर निवेश शुरू कर देते हैं। मगर एक ही फाइनेंशियल प्लानिंग सबके लिए फिट नहीं होता।

AMFI (एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया) के आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2024 तक भारत में करीब 4.2 करोड़ म्यूचुअल फंड निवेशक हैं, लेकिन इनमें से अधिकतर नए निवेशक हैं, जो ठीक से रिसर्च किए बिना निवेश करते हैं।

आइए जानते हैं, वो 5 बड़ी गलतियां जो आपको  म्यूचुअल फंड मे नहीं करनी चाहिए।

गलती #1: बिना गोल के इन्वेस्ट करना

बहुत से लोग सिर्फ इसलिए म्यूचुअल फंड में पैसा लगा देते हैं, क्योंकि “सब यही करते हैं” या “टैक्स बचाना है”। लेकिन उनके पास कोई क्लियर फाइनेंशियल गोल नहीं होता।

क्यों गलत है? बिना गोल के निवेश करने से आप,

  • गलत स्कीम चुन सकते हैं।
  • ज़रूरत पड़ने पर जल्दी पैसा निकाल लेते हैं।
  • लॉन्ग-टर्म वेल्थ नहीं बना पाते।

उदाहरण: अगर आपको 5 साल बाद घर का डाउन पेमेंट चाहिए, तो इक्विटी फंड में 100% निवेश करना रिस्की हो सकता है। बेहतर होगा हाइब्रिड या डेट फंड का मिक्स रखना।

कैसे बचें?

  • पहले अपने गोल लिखें, जैस की शादी, बच्चों की पढ़ाई, घर, रिटायरमेंट।
  • हर गोल के लिए टाइमलाइन (शॉर्ट-टर्म: 3 साल, लॉन्ग-टर्म: 10+ साल) तय करें।
  • उसी हिसाब से फंड कैटेगरी जैसे की इक्विटी, डेट, या हाइब्रिड का चुनाव करे।

गलती #2: सिर्फ पुराने रिटर्न देखकर फंड का चुनाव करना

“यह म्यूचुअल फंड ने पिछले साल 45% रिटर्न दिया है!” यह सुनकर लोग तुरंत इन्वेस्ट कर देते हैं। लेकिन पुरानी परफॉर्मेंस, भविष्य के रिजल्ट की गारंटी नहीं है।

क्यों गलत है? मार्केट की स्थिति बदलती रहती है। जो फंड 2023 में टॉप परफॉर्मर था, वो 2025 में अंडरपरफॉर्म कर सकता है।

SEBI गाइडलाइन्स भी साफ कहती हैं: “म्यूचुअल फंड निवेश बाज़ार जोखिमों के अधीन हैं। पुरानी परफॉर्मेंस भविष्य के रिटर्न का संकेत नहीं है।”

कैसे बचें?

  • सिर्फ पिछले साल की नहीं, बल्कि कम से कम 3-5 साल की परफॉर्मेंस देखें।
  • फंड की कंसिस्टेंसी चेक करें, हर साल अच्छा परफॉर्म किया है या सिर्फ एक बार?
  • एक्सपेंस रेशियो, फंड मैनेजर का अनुभव, और AUM (एसेट्स अंडर मैनेजमेंट) भी देखें।
  • मनीकंट्रोल, वैल्यू रिसर्च ऑनलाइन जैसी साइट्स पर रेटिंग और रिव्यू पढ़ें।

गलती #3: पोर्टफोलियो में ओवर-डायवर्सिफिकेशन करना।

कुछ लोग सोचते हैं कि जितने ज़्यादा फंड होंगे, उतना सेफ रहेगा। इसलिए वो 10-15 अलग-अलग फंड्स में इन्वेस्ट कर देते हैं।

क्यों गलत है? जब आपके पास बहुत सारे फंड्स होते हैं, तो:

  • ट्रैकिंग मुश्किल हो जाती है।
  • रिटर्न एवरेज हो जाते हैं। (अच्छे और बुरे दोनों फंड्स मिलकर कैंसल आउट हो जाते हैं)
  • एग्जिट लोड और एक्सपेंस रेशियो ज़्यादा लगता है।

कैसे बचें?

  • अलग-अलग कैटेगरी में इन्वेस्ट करें (लार्ज कैप, मिड कैप, डेट, हाइब्रिड), लेकिन हर कैटेगरी में सिर्फ 1-2 फंड्स रखें।
  • हर 6 महीने में पोर्टफोलियो रिव्यू करें, और कमजोर परफॉर्मर्स को हटा दें।
  • ओवरलैप चेक करें, कई फंड्स एक ही स्टॉक्स में इन्वेस्ट करते हैं, तो डायवर्सिफिकेशन का फायदा नहीं मिलेगा।

एक्सपर्ट की राय: ज़्यादातर फाइनेंशियल एडवाइजर कहते हैं, कि 5-7 अच्छी तरह चुने हुए फंड्स एक बैलेंस्ड पोर्टफोलियो के लिए काफी हैं।

गलती #4: मार्केट के उतार-चढ़ाव पर पैनिक करना

जब मार्केट गिरता है, और पोर्टफोलियो में नुकसान दिखता है, तो घबराकर लोग अपने फंड्स बेच देते हैं। और जब मार्केट हाई होता है, तब FOMO (फियर ऑफ मिसिंग आउट) में ज़्यादा इन्वेस्ट कर देते हैं।

क्यों गलत है? यह इमोशनल इन्वेस्टिंग है, जो लॉन्ग-टर्म वेल्थ क्रिएशन में सबसे बड़ी रुकावट है।

कैसे बचें?

  • SIP (सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान) करें, यह आपको मार्केट के सभी फेज़ में इन्वेस्ट करने की आदत डालता है।
  • लॉन्ग-टर्म माइंडसेट रखें, और कम से कम 5-7 साल के लिए इन्वेस्ट करें।
  • मार्केट करेक्शन को खतरा नहीं, बल्कि मौका समझें।
  • पोर्टफोलियो को हर दिन चेक करना बंद करें, महीने में एक बार चेक करें।

Data insights: 2020 में कोविड के दौरान जब सेंसेक्स 40,000 से गिरकर 25,000 पर आया, तो लाखों लोगों ने पैनिक हो कर अपने म्यूचूअल फंड यूनिट्स बेच दिए। लेकिन जिन्होंने होल्ड किया, उन्हें 2021-22 में रिकॉर्ड-ब्रेकिंग रिटर्न मिले।

गलती #5: एक्सपेंस रेशियो और छिपे चार्जेज को इग्नोर करना

लोग सिर्फ रिटर्न देखते हैं, और यह भूल जाते हैं कि म्यूचुअल फंड्स में एक्सपेंस रेशियो, एग्जिट लोड, और ट्रांजेक्शन चार्जेज भी लगते हैं।

क्यों गलत है? छोटा सा एक्सपेंस रेशियो भी लॉन्ग-टर्म में बड़ा फर्क डाल सकता है।

उदाहरण: आपने ₹10 लाख का इन्वेस्ट किया, और सालाना 12% रिटर्न, 20 साल के लिए, तो

  • अगर एक्सपेंस रेशियो 1% हे, तो फाइनल कॉर्पस ≈ ₹79 लाख बनेगा।
  • अगर एक्सपेंस रेशियो 2% हे, तो फाइनल कॉर्पस ≈ ₹67 लाख बनेगा।

फर्क: ₹12 लाख का नुकसान हुआ!

कैसे बचें?

  • हमेशा फंड का एक्सपेंस रेशियो चेक करें, डायरेक्ट प्लान में यह रेगुलर प्लान से कम होता है।
  • एग्जिट लोड पर ध्यान दें, कुछ फंड्स 1 साल से पहले निकालने पर 1-2% चार्ज करते हैं।
  • इंडेक्स फंड्स या ETFs पर विचार करें, इनमें एक्सपेंस रेशियो बहुत कम (0.1-0.5%) होता है। 

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रेगुलर प्लान vs डायरेक्ट प्लान कंपैरिजन

विशेषतारेगुलर प्लानडायरेक्ट प्लान
एक्सपेंस रेशियो1.5% – 2.5%0.5% – 1.5%
ब्रोकर कमीशनहाँ (शामिल)नहीं
रिटर्न (लॉन्ग-टर्म)कमज़्यादा (लगभग 1-1.5% ज़्यादा)
खरीदेएजेंट/एडवाइजर सेसीधे AMC वेबसाइट/ऐप से

म्यूचुअल फंड में निवेश से पहले इन मुख्य बातों का ध्यान रखें

  • गोल के हिसाब इन्वेस्टिंग करें, बिना टारगेट के निवेश मत करें।
  • पुराने रिटर्न से ज़्यादा फंड की कंसिस्टेंसी और फंडामेंटल्स देखें।
  • पोर्टफोलियो में 5-7 फंड्स से ज़्यादा मत रखें।
  • मार्केट की अस्थिरता से डरें नहीं, SIP जारी रखें।
  • एक्सपेंस रेशियो और चार्जेज को इग्नोर मत करें, डायरेक्ट प्लान को प्राथमिकता दें।

सही तरीके के साथ म्यूचुअल फंड निवेश आपके फाइनेंशियल गोल्स को पूरा करने का एक पावरफुल टूल बन सकता है। बस इन आम गलतियों से बचें और स्मार्ट निवेशक बनें!

हमारी राय

म्यूचुअल फंड निवेश में धैर्य और सही जानकारी सबसे बड़ी चीज़ है। जल्दबाज़ी में लिए गए फैसले अक्सर महंगे पड़ते हैं। अपने गोल क्लियर रखें, रिसर्च करें, और लॉन्ग-टर्म सोचें। याद रखें “धीरे-धीरे अमीर बनना” ही असली वेल्थ क्रिएशन का फॉर्मूला है!

डिस्क्लेमर: हम SEBI या RBI रजिस्टर्ड नहीं हैं। यह जानकारी शैक्षिक उद्देश्य के लिए है। किसी भी निवेश से पहले सर्टिफाइड फाइनेंशियल एडवाइजर से सलाह ज़रूर लें। हम निवेश सलाह नहीं देते।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

प्रश्न 1: म्यूचुअल फंड में इन्वेस्ट करने के लिए मिनिमम कितना पैसा चाहिए?

जवाब: SIP के ज़रिए आप सिर्फ ₹500 महीने से भी शुरू कर सकते हैं। लम्पसम में भी ज़्यादातर फंड्स ₹5,000 से शुरू हो जाते हैं।

प्रश्न 2: क्या म्यूचुअल फंड FD से बेहतर है?

जवाब: लॉन्ग-टर्म (5+ साल) में इक्विटी म्यूचुअल फंड्स आमतौर पर FD से ज़्यादा रिटर्न देते हैं। लेकिन यह मार्केट-लिंक्ड है, इसलिए रिस्क भी है। FD में गारंटीड रिटर्न मिलते हैं।

प्रश्न 3: SIP बंद करने पर क्या पेनल्टी लगती है?

जवाब: नहीं, SIP बंद करने पर कोई पेनल्टी नहीं है। लेकिन अगर आप यूनिट्स बेचते हैं, अगर होल्डिंग पीरियड कम है, तो एग्जिट लोड लग सकता है।

प्रश्न 4: डायरेक्ट प्लान और रेगुलर प्लान में क्या फर्क है?

जवाब: डायरेक्ट प्लान में आप सीधे AMC से खरीदते हैं, इसलिए ब्रोकर कमीशन नहीं लगता। इससे एक्सपेंस रेशियो कम होता है, और रिटर्न ज़्यादा मिलते हैं।

प्रश्न 5: पोर्टफोलियो में कितने फंड्स रखना सही है?

जवाब: फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स के मुताबिक 5-7 अच्छे फंड्स काफी हैं, अलग-अलग कैटेगरी (लार्ज कैप, मिड कैप, स्मॉल कैप, डेट, हाइब्रिड) में डायवर्सिफाई करके।

प्रश्न 6: मार्केट गिरने पर क्या SIP जारी रखनी चाहिए?

जवाब: हां, बिल्कुल! मार्केट गिरने पर आप कम प्राइस पर ज़्यादा यूनिट्स खरीदते हैं, जो लॉन्ग-टर्म में एवरेजिंग का फायदा देता है। इसे रुपी कॉस्ट एवरेजिंग कहते हैं।

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